😇चकरघिन्नी खान अशु
एक शहर, दो कानून, बर्दाश्त नहीं किए जा सकते…! वाकई नाकाबिल ए बर्दाश्त है, बर्दाश्त किए भी न जाना चाहिए…! नए शहर में शाम होते ही सन्नाटा… पुराने शहर में देर रात या पूरी पूरी रात सजी हुई महफिलें…! महा आपत्तिजनक है, आपत्ति जायज़ है…!
नए शहर की नई आबादी… सियासी लोग, नौकर पेशा जन, कारोबार लेकर आ बसी अवाम…! अलग अलग शहरों से आकर बसे अलग अलग विरासत वाले लोग…! इस नवाब कालीन शहर की विरासत भी नहीं जानते और तासीर भी नहीं…! इस शहर की विरासत में अब भी पटियों पर सजने वाली संस्कृति से भी वाकिफ नहीं हैं…! वह पटिया संस्कृति जिस पर कभी खान शाकिर अली खान से लेकर शंकर दयाल शर्मा तक… बाबू लाल गौर से लेकर आरिफ अकील तक सियासी शतरंज की बिसात बिछाते रहते थे…! पर्दा प्रथा के लिए मशहूर इस शहर ने पटियों की संस्कृति इसलिए भी प्रचलित हुई, कि पर्दानशी ख्वातीन का हिजाब भी बरकरार रहे और घर आए मेहमान का लिहाज़ और सत्कार भी…!
बाहर से आकर बसे हुए लोगों ने एक हिस्से को पुराना शहर का खिताब दिया… उसकी संस्कृति को अपनी पैतृकता से नकारने में वह अगुआ बनते तो शायद इतना नागवार भी न गुजरता…! शहर को अफसोस इस बात का हो सकता है कि संस्कृति को ठेंगा दिखाने वाले खुद को बर्रूकट कहलाने की दलील देते फिरते हैं…!
पुराने ने नए शहर की तरह जल्दी सोना शुरू कर दिया है…! जल्दी जागने की आदत भी आसान हो सकती है…! बाजार बंद करवाने के हिमायती अपनी जीत पर खुश हैं, होना भी चाहिए…! बंद बाजारों से खुशी उनके हिस्से भी कम नहीं है, जो इन इलाकों के बाशिंदे होने के कुसुरवार(?) हैं…! सारी रात के रतजगों में गुम होती युवा पीढ़ी और गर्त में जाता उनका भविष्य चिंतनीय था…! चौकसी करने वालों की छोटी लालच में बड़े अपराधों के हालात से भी फिक्र की पुकार उठी हुई थीं…! अब एक शहर, एक कानून व्यवस्था बहुत कुछ सुधार की तरफ ले जाती दिखा रही है… बस नुकसान होगा तो शहर की एक पुरातन संस्कृति के विलुप्त होने का…!
पुछल्ला
गति लेती सरकार
जब आए थे तो किसी के मन को नहीं मोह पा रहे थे। धीमी लेकिन मजबूत शुरुआत धीरे धीरे रंग जमाने लगी। योजनाओं की फिक्र, कमज़ोर तबके के लिए नरमी, उद्दंड के लिए सख्त उनका रवैया चाल पकड़ने लगा है। उम्मीद की जा सकती है, बेहतर नतीजों का सुखद पिटारा ज़रूर खुलेगा।
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04/जनवरी/2024

