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✍️खान अशु
क्या करें, क्या न करें हाय, कोई तो बताए इस मुश्किल का हल मेरे भाय…! काका जी के मन मस्तिष्क पर आजकल यही गीत गूंज रहा है…! सीएम से विधायक, अध्यक्ष से कार्यकर्ता… हर ओहदे के साथ “पूर्व” जोड़े बैठे काका जी के मन एक अरमान जाग ही रहा था… दिल्ली की गलियां फिर लुभाने लगी थीं… एक गली से आसान दौड़ लगाने का रास्ता मिल भी गया था…! इखरे बिखरे इनती गिनती के विधायकों को दावत दे डाली…! मन की बात जुबां पर आने की ही थी…! अचानक एक वज्रपात हो गया…! ज़ोर का झटका ज़ोर से ही लगा…! दिल के अरमान, दिल में ही सिमटते से महसूस होने लगे हैं…! अपने ही गिराते हैं, नशेमन पे बिजलियां… के हालात के साथ अपनों ने ही पतंग उड़ान भरने से पहले ही पेंच काटने की तैयारी कर दी है…! नए योद्धा के नाम पर जिन राजमाता को आगे करने की कूटनीति खेली गई है, उस नाम ने काका जी के मुंह दही जमा दिया है…! नाम पर सहमति देना मजबूरी, इनकार में हिलाई मुंडी निश्चित तौर से सियासी कद(?) को काटने का कारण बनेगा….! काका जी के कटते अरमानों के पन्नों में अब वह महाभारत भी लिखी जाने की ओर बढ़ जाए, जिसमें उन्हें वर्तमान की देश की सबसे बड़ी पार्टी का अंग बनने की तरफ बढ़ता दिखाया जा रहा है, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए…!
पुछल्ला
दिल्ली तेरी यही कहानी
फिर सड़क खुदाई। फिर कीलें और कांटे गड़ाई। दीवारों से कैद होती दिल्ली और प्यार मुहब्बत वाले दिन पर अन्न दाताओं की नफरत और गुस्से भरी हुंकार। दिल्ली का दिल पहले भी ऐसे सदमे खेल चुका है, इसलिए नए ज़ख्म सहने से सहमा हुआ है।

